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गूंजेगी शहनाई: देवउठनी एकादशी आज, चार महीने से सोए देव जागे, शुरू हुए मांगलिक कार्य…

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गूंजेगी शहनाई: देवउठनी एकादशी आज, चार महीने से सोए देव जागे, शुरू हुए मांगलिक कार्य…

देव उठनी एकादशी आज है। महिलाओं ने सूप पीट दिया है। 4 महीने से सोए देव जाग गए हैं। इसी के साथ मांगलिक शुभ कार्यों की शुरुआत हो चुकी है। अब आने वाले 5 महीनों में बैंड, बाजा-बारात (शहनाई) गूंजेगी। बता दें कि देवउठनी एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इसे हरिप्रबोधिनी एकादशी या देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं। देवोत्थान एकादशी दीपावली के बाद आती है। इसी दिन भगवान शिव की प्राचीन नगरी वाराणसी में देव दिवाली भी मनाई जाती है। दीपावली के बाद लोग देव जागने की तैयारी भी करने लगते हैं। ‌माना जाता है कि भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी को चार माह के लिए सो जाते हैं और कार्तिक शुक्ल की एकादशी को निद्रा से जागते हैं। देव उठनी एकादशी के दिन से चतुर्मास का अंत होता है जिसमें श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक माह शामिल हैं। मान्यता अनुसार इन चतुर्मास के दौरान भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं। कहा जाता है कि इन चार महीनो में देव शयन के कारण समस्त मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं। जब देव (भगवान विष्णु ) जागते हैं, तभी कोई मांगलिक कार्य संपन्न हो पाता है। इस दिन पूजा के बाद सूप पीटने की परंपरा है। महिलाएं भगवान विष्णु के घर में आने की कामना करतीं हैं और सूप पीटकर दरिद्रता भगाती हैं। आज भी यह परंपरा बनी हुई है । बता दें कि आज से शुरू हुए मांगलिक कार्य अब 5 महीने तक जारी रहेंगे। ‌ देवउठनी एकादशी का शुभ मुहूर्त। एकादशी तिथि 14 नवंबर को प्रातः 05 बजकर 48 मिनट से प्रारंभ होकर 15 नवंबर प्रातः 06 बजकर 39 मिनट पर समाप्त होगी।

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देव उठनी एकादशी के दिन तुलसी-शालीग्राम का विवाह भी किया जाता है—

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बता दें कि देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी शालीग्राम जी का विवाह होता है। तुलसी विवाह के लिए एक चौकी पर आसन बिछा कर तुलसी और शालीग्राम की मूर्ति स्थापित करें। चौकी के चारों और गन्ने का मण्डप सजाएं और कलश की स्थापना करें। सबसे पहले कलश और गौरी गणेश का पूजन करें। उसके बाद माता तुलसी और भगवान शालीग्राम को धूप, दीप, वस्त्र, माला, फूल अर्पित करें। तुलसी माता को श्रृंगार के सामान और लाल चुनरी चढ़ाएं। ऐसा करने से सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मिलता है। पूजा के बाद तुलसी मंगलाष्टक का पाठ करें। हाथ में आसन सहित शालीग्राम को लेकर तुलसी के सात फेरे लें। फेरे पूरे होने के बाद भगवान विष्णु और तुलसी की आरती कर प्रसाद वितरित करें।

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भगवान विष्णु की पूजा-आराधना करने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है–

सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु हैं, जिनकी कृपा से ही इंसान के सारे कष्ट दूर होते हैं और उनको हर सुख मिलते हैं। विष्णु जी की पूजा करने से इंसान को सुख-शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यता है कि देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा-अराधना करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और भक्त मृत्युोपरांत विष्णु लोक को प्राप्त करता है। पौराणिक कथा के अनुसार माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए महर्षि मेधा ने शरीर त्याग कर दिया और उनका अंश पृथ्वी में समा गया। चावल और जौ के रूप में महर्षि मेधा उत्पन्न हुए, इसलिए चावल और जौ को जीव माना जाता है। जिस दिन महर्षि मेधा अंश पृथ्वी में समाया था, उस दिन एकादशी तिथि थी। इसलिए इस दिन चावल खाने से परहेज करना चाहिए।

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