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बूढ़ाकेदार मोटर मार्ग आन्दोलन की एक झलक ।* भाग 4

उत्तराखंड

बूढ़ाकेदार मोटर मार्ग आन्दोलन की एक झलक ।* भाग 4

*बूढ़ाकेदार मोटर मार्ग आन्दोलन की एक झलक ।*
*लेखकः शम्भुशरण रतूड़ी*

भाग 4

मेरी अप्रकाशित पुस्तक *विद्रोही पथ का राही* के कुछ अंश)
*गातांक से आगे (4) ……………*

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जैसे कि मैं लिख चुका हूं कि प्रशासन के डराने धमकाने के बाबजूद भी आन्दोलनकारी और भी जोश खरोश के साथ टिहरी के लिये के लिये कूच किया पर सिरवाड़ी में कई महिलाएं भी आन्दोलन का हिस्सा बनने को तैयार होकर आयी थी अर्थात टिहरी जाने के लिये ! लेकिन महिलाओं और बच्चों को नेगीजी के समझाने के बाद वापिस भेज दिया । तब तक *लोकजीवन विकास भारती- बूढ़ाकेदार* के करीब 20-22 लोग हाथ में बैनर लिये, सर्वोदयी नेता *भाई बिहारीलालजी* के नेतृत्व में आन्दोलन में शरीक होने के लिये सिरवाड़ी में पहुँच गये । बेहद अनुशासन और कतारबद्ध में क्रांतिकारी उदघोष के साथ टिहरी के लिये प्रस्थान !
चानी में व डालगांव के नीचे श्री राधाकृष्णजी सेमवाल, श्री नारायणसिंह जी बिष्ट तथा चानी के प्यारचंदजी (सचिव) क्षेत्र की जनता के साथ *बाजणौं* के साथ सम्मिलित हुये जबकि तलेबन में सर्वश्री गब्बरसिंह कठैत, शूरबीरसिंह पंवार, सोबतसिंह कठैत, दयाराम रतूड़ी, कबूलचंद कंडारी के नेतृत्व में ढोल-बाजणौं के साथ बासर
के आन्दोलनकारीयों के साथ सम्मिलित हुये । जगह जगह आन्दोलनकारी बढ रहे थे । लाटा में आरगढ और गोनगढ के लोग भी सम्मिलित हुये । अब देखिये ! मोटर मार्ग का नाम *चमियाला- बूढ़ाकेदार* यानी चमियाला से सीधे बूढ़ाकेदार सड़क जानी थी । और खास बात इस सड़क में यह थी कि *चमियाला से बूढ़ाकेदार* तक एक भी गांव इस सड़क में नहीं पड़ता ! और आज भी नहीं । तो भी बासर के साथ आरगढ-गोनगढ की जनता इस आन्दोलन में शरीक हुयी ! क्यों ?
उत्तर साफ था – पूरे क्षेत्र की जनता को एक नौजवान लीडर मिल रहा था ! लोगों में *बलबीरसिंह सिंह* पर पूरा भरोसा था और संभावनाएं भी । और जनता का आकलन भी सही भी था कि *बड़े बाप का बेटा, धर्म जिज्ञासु माँ ! जिसके घर से कोई भूखा नहीं गया होगा, उस जमाने में क्षेत्र का पहला *सदावर्त* बांटने वाली महिला का बेटा ! चार भाईयों में सबसे छोटा और लाडला ! अर्थात सबसे बड़े भाई श्री सूरतसिंह नेगी जो स्वास्थ विभाग में एक कर्मठ और ईमानदार अफसर, मंजले भाई डाक्टर नरेन्द्रसिंह नेगी, जो जनपद टिहरी व उत्तरकाशी में *डाक्टर नेगी* के नाम से विख्यात थे तीसरे भाई पूरणसिंह नेगी जो फौज में थे । कहने का तात्पर्य यह है कि- यदि चाहते तो *बलबीरसिंह नेगी* चांदी की थाली में सोने के चम्मच से खाना खा सकते थे ! लखनऊ से LLB की डिग्री लेकर आये थे और टिहरी में अपने जिजाजी, प्रसिद्ध एडवोकेट श्री सावनचंद रमोला के सानिध्य में वकालात भी जोड़दार चल रही थी ।
पर इन सब शाही सुविधाओं को तिलांजलि देकर *बलबीरसिंह नेगी* ने दूसरा ही रास्ता अखत्यार किया । यद्यपि यह बात यहाँ उलेख करना मात्र प्रसांगिक है क्योंकि यह विशेष लेख मोटर मार्ग के संबंध में है न कि बलबीरसिंह नेगी जीवनी ! पर यह भी सत्य है कि क्षेत्र की जनता को एक जुझारु नेता तो मिल ही गया था !
बहराल, आन्दोलनकारियों का भारी जत्था अपने पारम्परिक परिधान *डिगला-मुँड्याशा व रियूंस* की लाठियों के साथ चमियाला पहुंचा । वहां से बस (गाड़ी) की व्यवस्था थी । पर वहां पर एक छोटी सी घटना हो गयी । कि पिन्स्वाड़ के एक आन्दोलनकारी की तबियत ज्यादा खराब हो गयी ।तो उसे किसी भी प्रकार प्राथमिक इलाज के लिये घनशाली पहुंचाना था । तो हमने टिहरी से आये एक वकील-नेता से विनय की कि कृपया इस आदिमी को अपनी कार में घनशाली पहुंचा दो ताकि शीघ्र ही इलाज मिल सके । लेकिन उस वकील-नेता ने हां तो कह दी पर पलक झपकते वहां से गायब हो गया ! तब पता लगा कि अमुक वकील-नेता के साथ आये 2-3 छुट्टभैय्या नेता प्रशासन के चाटुकार बनकर आन्दोलन की जानकारी लेने चमियाला आये थे । लेकिन जब उन *शकुनियों* ने आन्दोलन का जत्था व आन्दोलनकारीयों का रुप देखा तो वे उल्टे पांव वहां से भाग खड़े हुये । यद्यपि शीघ्र ही नेगीजी के एक शुभचिन्तक ने अपनी कार में उस बिमार आन्दोलनकारी को डाक्टर के पास घनशाली पहुंचाया ।
एक और लोमहर्षक वाकया हुआ । चूंकि आन्दोलन में सर्वोदयी *भाई बिहारीलालजी* लोजिविभि के बैनर लिये कार्यकर्ताओं के साथ
चल रहे थे । और उनके पास कंधे वाला माइक भी था । अर्थात वे खूब जोशखरोश के साथ आन्दोलनकारीयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे । तब किसी अज्ञात व्यक्ति ने *भाई बिहारीलालजी* को एक पर्ची पकड़ायी जिस पर सर्वोदय के एक बड़े नेता ने लिखा था- *बलबीरसिंह नेगी के नेतृत्व में चल रहा यह आन्दोलन राजनीतिक है अतः आप शीघ्र इस आन्दोलन से किनारे हो जाइये…..*भाई बिहारीलालजी ने उसी पर्ची पर प्रत्युत्तर दिया-* मान्यवर ! ऐसा राजनीतिक आन्दोलन क्षेत्र के विकास के लिये सौ बार भी होगा तो मैं उसमें हिस्सा लूंगा । मैं इसे सत्याग्रह मानकर साथ चल रहा हूं* और अमुक नेता को वह पत्र लौटा दिया । जबकि आन्दोलन में साथ चल रहे बासर के एक वरिष्ठ सर्वोदयी नेता किनारे हो गये ।
*जारी ……..*आगे आप पढेंगे कि प्रशासन ने आन्दोलनकारीयों की गाड़ीयों को सिमलासू में क्यों रोक दी ? कैलापीर के नगाड़े की आवाज सुनकर क्यों अधिशाषी अभियन्ता J P शर्मा रोने बैठ गया ………? क्लिक कीजिए

 

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